सच असाधारण झूठ है
जन्म की भावना, शिशु की है
या माँ की या पिता की
मैं पिता हूँ, यह अभी सच नहीं
पिता पुरुष से कितना अलग है
सब राह के राहगीर हैं
कुछ चल पड़े बिना राह के
धूल को पसीने से बाँधते
धूल सच है या झूठ
पत्थर धूल बँधने से बना
क्या पत्थर में जल है
थोड़ा तो होगा
माँ ने आँटे में जल डाला
और तुलसी के पत्तों पर
एक जैसा पवित्र भाव
सबके लिए रोटियाँ सेंकना
अग्नि सोख लेती कुछ जल
कुछ से बँध जाती रोटी
यही झूठ का सच है
सच असाधारण झूठ है
©Rajesh Srivastava