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दो सखियाँ

एक मौन ही किस द्वार पर तुम रच रही हो अल्पना लघु हस्त में किंशुक लिए मूर्त करती कल्पना दो हे सखी, मेरे मन आँगन में जो बसी मौन झंकार सदा से उसी अगति को जीवन लय देने शून्य क्षेत्र … Continue reading →

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